तेनालीराम की कहानियाँ | Tenaliram ki kahaniya in hindi

तेनालीराम की कहानियाँ  (Tenaliram ki kahaniya in hindi) बाबापुर की रामलीला – तेनालीराम हमेशा अपनी बुद्धिमता से सबका मन जीतने के लिए जाने जाते थे। राज्य पर आई किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए वह अपना दिमाग तुरंत लगाया करते थे। इसी तरह जब एक बार दशहरा पर नाटक मंडली विजयनगर नहीं पहुंच पाई, तो तेनालीराम ने क्या किया, आइए जानते हैं।

तेनालीराम की कहानियाँ

तेनालीराम विजयनगर में महाराजा कृष्णदेव के राज्य दरवार में रहा करते थे। तेनालीराम महाराजा के बहुत प्रिय थे। वह राज्य में किसी भी समस्या का समाधान बहुत ही जल्दी किया करते थे। महाराज तेनालीराम की इसी खुबी के कारण उनसे प्रसन्न रहते थे।

विजयनगर में हर साल काशी से एक नाटक मंडली दशहरे से पहले आया करती थी। यह नाटक मंडली विजयनगर में रामलीला किया करती थी। नाटक मंडली विजयनगर में नगर वासियों का मनोरंजन किया करती थी। यह एक तरह से विजयनगर की संस्कृति थी और ऐसा हर साल हुआ करता था।

एक साल ऐसा हुआ जब काशी से दशहरे से पहले एक संदेश विजयनगर आया की नाटक मंडली के कई सदस्य बीमार पड़ गए है और उन्होंने कह दिया कि वो विजयनगर नहीं आ पाएंगे। यह सुनकर महाराज कृष्णदेव राय और सारी प्रजा बहुत उदास हो गई।

दशहरे को अब सिर्फ कुछ ही दिन बाकी थे। ऐसे में किसी और नाटक मंडली को बुलाकर रामलीला का आयोजन करवाना बहुत मुश्किल था। दरबार के मंत्रियों और राजगुरु ने आसपास के गांव की नाटक मंडली को बुलाने की कोशिश की, लेकिन किसी का भी आ पाना बहुत मुश्किल था। सबको निराश देख तेनालीराम ने कहा, “मैं एक नाटक मंडली को जानता हूं। मुझे यकीन है कि वो विजयनगर में रामलीला करने के लिए जरूर तैयार हो जाएंगे।”

तेनालीराम की यह बात सुनकर सब खुश हो गए। उसके साथ ही राजा ने तेनाली को मंडली बुलाने की जिम्मेदारी सौंप दी और तेनालीराम ने भी रामलीला की तैयारी करना शुरू कर दी। विजयनगर को नवरात्र के लिए सजाया जाने लगा। रामलीला मैदान की साफ-सफाई करवा कर वहां बड़ा-सा मंच बनवाया गया। उसी के साथ मैदान पर बड़ा-सा मेला भी लगवाया गया।

जब विजयनगर में रामलीला होने की खबर फैली गई तो सारी नगर की जनता रामलीला देखने के लिए उत्सुक हो गई। देखते-देखते रामलीला का दिन भी आ गया। नगर के सभी लोग रामलीला देखने के लिए मैदान में इकट्ठे होने लगे।

महाराज कृष्णदेव राय भी सभी मंत्रीगण और सभा के अन्य सदस्यों के साथ वहां मौजूद थे। सभी ने रामलीला का खूब मजा उठाया। जब नाटक खत्म हो गया, तो सभी ने उसकी बहुत तारीफ की। खासकर, नाटक मंडली में मौजूद बच्चों की कलाकारी सभी को बहुत पसंद आई थी। महाराज सभी से इतना खुश थे कि उन्होंने पूरी नाटक मंडली को महल में तभी खाना खाने का न्योता दे दिया।

जब पूरी मंडली महल आई, तो सभी ने महाराज, तेनालीराम और अन्य मंत्रीगण के साथ भोजन किया। इस दौरान महाराज ने तेनालीराम से पूछा कि उन्हें इतनी अच्छी मंडली कहां से मिली?

इस पर तेनालीराम ने उत्तर दिया, यह मंडली बाबापुर से आई है, महाराज। यहीं विजयनगर के पास ही है, महाराज।

तेनालीराम की यह बात सुनकर मंडली के सदस्य मुस्कुराने लगे। इस पर महाराज ने उनसे मुस्कुराने की वजह पूछी, तो मंडली का एक बच्चा बोला, “महाराज, हम विजयनगर के ही रहने वाले हैं। इस मंडली को तेनाली बाबा ने तैयार करवाया है और इसलिए हमारी मंडली का नाम बाबापुर की मंडली है।”

बच्चे की यह बात सुनकर महाराज सहित सभी लोग ठहाके लगाके हसंने लगे।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसे दूर न किया जा सके। इसके लिए बुद्धिमानी से काम लेने की जरूरत होती है, जैसे इस कहानी में तेनालीराम ने किया।

तेनालीराम की कहानी मनपसंद मिठाई

तेनालीराम हमेशा से ही अपने नायाब तरीकों से जवाब देने के लिए जाने जाते थे। उनसे कोई भी सवाल पूछा जाए, तो वह हमेशा एक अलग अंदाज के साथ जवाब देते थे। चाहे वो सवाल क्यों न उनकी मनपसंद मिठाई का हो। इस कहानी में जानते हैं किस तरह से तेनालीराम ने अपनी मनपसंद मिठाई के बारे में महाराज कृष्णदेव राय को नाम बताई।

सर्दियों का मौसम था। एक दोपहर महाराज कृष्णदेव राय, राजपुरोहित और तेनालीराम महल के बागीचे में टहल रहे थे और धूप का आनंद ले रहे थे। महाराज बोले, “इस बार बहुत गजब की ठंड पड़ रही है। सालों बाद ऐसी ठंड नहीं पड़ी। ये मौसम तो भरपूर खाने और सेहत बनाने का है। क्यों राजपुरोहित जी, क्या कहते हैं?” राजपुरोहित ने जवाब दिया बिल्कुल सही कह रहे हैं महाराज आप। इस मौसम में मिठा खाना काफी लाभदायक होता है। जैसे-ढेर सारे सूखे मेवे, फल और मिठाइयां खाने का मजा ही अलग होता है”।

मिठाइयों का नाम सुनकर महाराज बोले, “यह तो बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। वैसे ठंड में कौन-कौन सी मिठाइयां खाई जाती हैं?”

राजपुरोहित बोले, “महाराज सूखे मेवों की बनी ढेर सारी मिठाइयां जैसे काजू कतली, बर्फी, हलवा, गुलाब जामुन, ये हमारे शरीर को गर्म रखने में काफी मदद करती है ताकि हमें ठण्ड छू भी ना सकें। ऐसी और भी कई मिठाइयां हैं, जो हम ठंड में खा सकते हैं।”

यह सुनकर महाराज हंसने लगे और तेनालीराम की तरफ मुड़कर बोले, “आप बताइए तेनाली। आपको ठंड में कौन सी मिठाई पसंद है?”

इस पर तेनाली ने जवाब दिया, महाराज, राजपुरोहित जी, आप दोनों रात को मेरे साथ महल के बाहर चलिए मैं आपको अपनी मनपसंद मिठाई खिला दूंगा। “महाराज ने बोले“ आपको जो मिठाई पसंद है, हमें बताइए। हम महल में ही बनवा देंगे।

”तेनाली ने बोले” नहीं महाराज, वह मिठाई यहां किसी को बनानी नहीं आएगी। आपको मेरे साथ खाने के लिए बाहर ही चलना होगा।

”महाराज ने हंसकर कहा चलिए ठीक है।” आज रात को ही खाना खाने के बाद हम आपकी मनपसंद मीठाई खाने आपके साथ चलेंगें।

रात को खाना खाने के बाद महाराज और राजपुरोहित ने साधारण कपड़े पहने और चुपचाप महल से निकल कर तेनाली के साथ चल पड़े। गांव पार करके, खेतों में बहुत दूर तक चलने के बाद महाराज बोले, “हमें और कितना चलना पड़ेगा तेनाली? आज तो तुमने हमें थका दिया है।

“तेनाली ने उत्तर दिया” बस कुछ ही दूर और है महराज।

जब वो लोग खेतों के बीच पहुंचे तो उन्हें मिठाई की खुशबु आने लगी। महराज ने बोला लगता है हम आपकी मनपसंद जगह पहुंच गए, तो तेनाली ने मुरूकुराया और महाराज और राजपुरोहित को एक खाट पर बैठने को कहा और खुद वो मिठाई लेने चले गए। थोड़ी देर में वे अपने साथ तीन कटोरियों में गर्मा गर्म मिठाई ले आए। जैसे ही महाराज ने उस मिठाई को चखा उनके मुंह से वाह से अलावा और कुछ नहीं निकला। महाराज और राजपुरोहित एक बार में ही पूरी मिठाई चट कर गए।

इसके बाद दोंनो ने तेनाली से कहा, मजा आ गया! क्या थी यह मिठाई? हमने यह पहले कभी नहीं खाई है।”

महाराज की बात पर तेनालीराम मुस्कुराए और बोले, “महाराज ये गुड़ था। यहां आस-पास गन्नों का खेत है और किसान उसी से यहां रात को गुड़ बनाते हैं। मुझे यहां आकर गर्मागर्म गुड़ खाना बहुत पसंद है। मेरा मानना है कि गर्मागर्म गुड़ भी बेहतरीन मिठाई से कम नहीं होता है और गुड़ हमारे शरीर को अंदर से गर्म रखता है गुड़ खाने से कई फायदे भी है।”

महराज ने तेनाली राम की बातें सुनने के बाद उससे कहां मुझे तो यकिन ही नहीं हुआ की हम गुड़ खा रहे थे। इसी बात पर हमारे लिए एक कटोरी मिठाई और ले आइए।”

इसके बाद तीनों ने एक-एक कटोरी गुड़ और खाई और फिर महल को लौट गए।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है। हमें छोटी-छोटी चीजों में भी वो खुशियां मिल सकती है, जो कई पैसे खर्च करने पर भी नहीं मिलती सिर्फ फर्क हमारे सोचने का है। अगर हम अपनी सोच बदलें तो हम अपने जीवन में किसी भी परिस्थितियों में खुश रह सकते है। मनुष्य अगर खुश रहे तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर वह बिमार नही पड़ सकता। खुश रहना अपने आप में एक थैरेपी का काम करती है जो सभी मौसम में आपकों तंदरूस्त रखती है।

तेनालीराम की कहानी – जादूगर का घमंड

एक दिन राजा कृष्ण देव राय के दरबार में एक बहुत ही प्रसिद्ध जादूगर आया। उसने बहुत देर तक सबको हैरान कर देनेवाली अपनी जादूई करतब दिखाई।

पूरे दरबार में उसकी वाह-वाही किये और उनसे साथ में सबका भरपूर मनोरंजन किया। वहाँ से जाते समय राजा से उसे ढ़ेर सारे उपहार भी प्राप्त हुआ, पर जादूगर जाते-जाते अपनी कला के घमंड में सबको चुनौती दे डाली-

उसने कहा कि “क्या कोई व्यक्ति मेरे जैसे अद्भुत करतब दिखा सकता है? क्या कोई भी राजा कृष्ण देव राय के दरबार मे ऐसा नही जो मुझे यहाँ टक्कर दे सकता है?

इस खुली चुनौती को सुन कर सारे दरबारी चुप हो गए। परंतु तेनालीराम को इस जादूगर का यह इतना अभिमान अच्छा नहीं लगा।
वह तुरंत उठ खड़े हुए और बोले कि हाँ मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि जो करतब मैं अपनी आँखें बंद कर के दिखा दूँगा वह तुम खुली आंखो से भी नहीं कर पाओगे। अब बताओ क्या तुम मेरी चुनौती स्वीकार करते हो?

जादूगर अपने अहंकार में अंधा था। उसने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।

तेनालीराम ने रसोईयों को दरवार में बुलाया और बोला रसोई से मिर्ची का पाउडर ले आए। दरवार में बैठे लोग सोचने लगे ये तेनालीराम मीर्च पाउडर का क्या करेगा?

कहीं यह पुरे राज्य की बदनामी ना करा दे। इसे हर व्यक्ति से उलझने की क्या पड़ी है। अब देखते है यह क्या करेगा।

दरवार में जब मिर्ची का पाउडर आया तो तेनालीराम ने अपनी आँखें बंद की और उन पर एक मुट्ठी भर मिर्ची पाउडर डाल दिया। फिर थोड़ी देर में अपनी आंखें के उपर से मिर्ची पाउडर झटक कर कपड़े से आँखें पोंछ कर शीतल जल से अपना चेहरा धो लिया। और फिर जादूगर से कहा कि अब तुम खुली आँखों से यह करतब करके अपनी जादूगरी का नमूना दिखाओ।

घमंडी जादूगर को अपनी गलती समझ आ गया। उसने सबसे हाथ जोड़ कर माफी मांगी और राजा के दरबार से चला गया।
राजा कृष्ण देव राय अपने चतुर मंत्री तेनालीराम की इस बुद्धिमानी से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होने तुरंत तेनालीराम को पुरस्कार दे कर सम्मानित किया और राज्य की इज्जत रखने के लिए धन्यवाद दिया।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आपके पास ज्ञान कितना भी हो पर उस ज्ञान पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए। घमंड होने से ज्ञान की कोई भी महत्व नही होता है। लोग हमेशा शांत स्वभाव के लोगों की ज्ञान को ही पसंद करते है।

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