मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ | Munshi Premchand ki Kahaniyan

Munshi Premchand ki Kahaniyan: किसी गांव में एक लता नाम की लड़की अपनी मां के साथ रहती थी। लता की उम्र दस वर्ष थी। वह एक गरीब परिवार से थी। वह अपना और अपनी मां का पेट भरने के लिए अपने ही गांव के चौधरी के घर झाडू-पोछा का काम किया करती थी।

एक दिन की बात है जब लता चौधरी के घर झाडू लगा रही थी, तो उसे एक सोने की असर्फी मिली। लता ने उस असर्फी को अपने हाथों में उठा लिया और कुछ देर उसे निहारती रही। उसके बाद चौधरी के कमरे में जाकर लता ने चौधरी से कहा उसे झाड़ू करते समय यह असर्फी मिली है। यह बोलते हुए वापस कर दिया।

चौधरी ने लता से पूछा की बेटी क्या तुम्हें इस असर्फी की क़ीमत मालूम है? उसपर लता ने उसे कहा जी मालिक मेरी पूरी जिंदगी की आधी कमाई है। यह सुनकर चौधरी हैरान हो गया। चौधरी ने फिर लता को बोला तो तुम यह अपने पास भी तो रख सकती थी। तुमने मुझे क्यों लोटा दिया?

लता ने चौधरी को बोला मालिक, मैं अपनी मेंहनत से जो भी कमाती हूँ उसमें से मेरा और मेरी मां का पेट भर जाता है।
मेरी मां ने मुझे सीखाया है कि मेहनत और ईमानदारी के पैसे कमानी चाहिए। चोरी और बईमानी से आपकी जरूरत तो पूरी हो जाएगी। पर आपको चैन की निंद नहीं आएगी।

यह असर्फी भी आपकी है, तो मैंने आपको लौटा दिया, जो मेरा नहीं है उसे मैं अपने पास नही रख सकती।

चौधरी लता की बात सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ और लता को ईनाम के तौर पर एक चांदी का सिक्का देने लगता है। लता उस सिक्के को नहीं लेना चाहती थी, तो चौधरी ने उसे कहा की वह ईनाम के तौर पर उसे दे रहा है। लता उस चाँदी के सिक्के को ले लेती है।

लता जब घर जाती है तो खुश होकर चाँदी का सिक्का अपनी मां को दिखती है और बोलती है कि चौधरी ने वह सिक्का उसे दिया है। उसकी मां लता की पूरा बात जाने बिना ही लता को मारने लगती है।

लता जब जोर-जोर से रोने लगती है और बोलती है मां मैंने चोरी नहीं किया। उसके बाद पूरी कहानी मां को सुनाती है। उसके बाद उसकी मां उसे गले से लगा कर चुप करवाती है। मां लता के लिए खाना परोसने रसोई घर में चली जाती है।

तभी एक बाबा वहां आते है और भिक्षा मांगते है, लता उन्हें वह चाँदी का सिक्का देने लगती है और बोलती है बाबा मेरे घर में अनाज नहीं है। सिर्फ दो रोटी ही है। एक मेरी मां और एक मेरे लिए।

अगर उसमें से एक रोटी मैं आपको दे देती पर मेरी मां भूखी रह जाएगी। आप यह सिक्का ले लो आप किसी को यह दे देना। आपको पेट भर खाने के लिए भोजन मिल जायेंगे।

लता की बात सुनकर बाबा बहुत खुश होता है। परन्तु लता से सिक्के लेने से इन्कार कर देता है। मगर बाबा लता की बात सुनकर उसे अपने थैले से एक मुर्गी निकाल कर उसे देते है। और बोलते है कि लो बेटी यह तुम रख लो सच बोलने का वह तोफा लता लेने से मना कर देती है।

बाबा जी मुझें माफ़ करना। मैं यह उपहार आपसे नहीं ले सकती। मेरी मां नाराज होगी। तभी उसकी मां घर से बाहर लता को ढूँढने आ जाती है और लता को बाबा से बात करते सुनती है। बेटी ले लो यह बाबा का आर्शीवाद समझकर लेलो, यह कोई साधारण मुर्गी नहीं है, चमत्कारी मुर्गी है। तुम्हारी मां तुम्हें नहीं डांटेगी।

लता बाबा से मां के सामने मुर्गी ले लेती है। बाबा लता को बोलते है कि लता तुम कभी भी लालच मत करना और ना ही कभी मेहनत करने से पीछे हटना, अपनी मन में कभी भी किसी के प्रति ईष्या आने मत देना। बेटी तुम जैसी हो वैसी ही रहना नही तो मै तुमसे यह चमत्कारी मुर्गी वापस ले लूंगा।

लता बाबा से वादा करती है कि वह जैसी है वेसे ही सदा रहेगी। उसके बाद लता अपनी मां के साथ घर के अंदर आ जाती है। उस मुर्गी को एक टोकड़ी से नीचे रखकर अपनी रोटी से एक टुकड़ा तोड़कर मुर्गी को भी दे देती है और मां के साथ रोटी खाकर सो जाती है।
सुबह जब लता जागती है तो उस मुर्गी को टोकड़ी से बाहर निकालती है तो लता को मुर्गी के पास एक सोने का अण्डा मिलता है।
लता को बाबा की बात याद आती है। यह तो सचमुच एक चमत्कारी मुर्गी है और लता बहुत खुश हो जाती है।

सोने के अण्डे को लेकर लता बाजार पहुंचती है। लता से वह अण्डा कोई नही खरीदता और ना ही उसके बदले में उसे कोई सामान देता है।
लता को अचानक चौधरी की याद आती है। वह तुरन्त चौधरी के घर जाती है उसे वह सोने का अण्डा दिखती है और बोलती है क्या वह इस अण्डे के बदले उसे पैसे देगें।

चौधरी लता के पास सोने का अण्डा देख चौक जाता है। वह अण्डा एक दम खड़ा सोना था। चौधरी के मन में भी लालच आ जाता है। वह पूछता है कि यह अण्डा उसे कहां मिला?

लता चौधरी से झुठ बोलती है कि वह अण्डा उसे अपनी झोपड़ी के बाहर मिला है। चौधरी समझ जाता है कि लता उससे झुठ बोल रही है पर वह यह जानता है था कि लता ने चोरी तो नहीं की होगी।
चौधरी लता से पूछता है, कि वह काम पर कब से आएगी। ना तो उसने छुट्टी के लिए बोला ना ही कुछ खबर भेजवाई। लता ने चौधरी को बोला अब वह झाड़ू का काम नहीं करेगी। चौधरी ने बोला अगर काम नही करोगी तो तुम्हारा गुजारा कैसे होगा?

लता ने इस बात का कोई भी जवाब चौधरी को नहीं दिया। चौधरी ने भी उस अण्डे के बदले लता को थोड़े से पैसे दे दिए, उस पैसे से लता अपने और अपनी मां के लिए कपड़े, जूते और खाने के लिए अच्छी- अच्छी मिठाईयां और पकवान बाजार से लेकर घर जाती है।

लता को इतना सारा सामान के साथ देखकर उसकी मां लता पर फिर से नाराज हाती है कि वह कहां से लाई। लता उसे बाबा की दी चमत्कारी मुर्गी के बारे में बताती है।

लता हर सुबह चौधरी के घर जाती और उसे एक सोने का अण्डा देकर उससे पैसे ले आती। चौधरी रोज किसी ना किसी बहाने लता से जानने की कोशिश करता की वह यह अण्डा कहाँ से लाती पर लता उसे रोज झुठ बोलकर एक नई कहानी सुना देती।

एक सुबह लता ने चौधरी से पूछा की उसे हवेली बनाने के लिए कितने पैसे लगेगे। चौधरी ने लता को बोला एक अण्डे की जगह अगर वह दो अण्डा उसे लाकर दे तो एक सप्ताह में उससे भी बड़ी और उंची हवेली बन जाएगी। लता ने फिर चौधरी को बोला वह तो नहीं हो सकता। चौधरी बोला क्यों नहीं हो सकता?

तुम दो अण्डे लाया करो। लता बोलती है पर मुर्गी एक दिन में एक ही अण्डा देती है। कौन सी मुर्गी है लता जो सोने का अण्डा देती है, और तुम्हें यह मुर्गी कहां मिली?

लता चौधरी को सारी बातें बता देती है। चौधरी लता को बोलता है उस मुर्गी को बोल तुम्हें दो अण्डे रोज चाहिए। अगर प्यार से मुर्गी तेरी बोत ना सुनें तो उसे थोड़ा डरा देना। तुम्हारे हाथ तो जिन्न लग गया है लता उस मुर्गी के रूप में।

लता भी चौधरी की बात में आ गयी, लता में देखते-देखते इतनी लालच हो गय कि वह घर जाने के बाद उस मुर्गी को बोली कि उसे हर रोज अब दो अण्डे चाहिए। एक अण्डे से लता का सपना पुरा नहीं हो सकता।

लता कि मां जब लता को मुर्गी से बोते करते सुनी तो उसने लता को बोला कि तुम चौधरी के यहां काम करना बंद मत करो। पहले भी तो उसका गुजारा लता के काम करने से हो रहा था। जो मुर्गी अण्डे देगी उन पैसों से वह घर बना लेगी।

यह बात सुनते ही लता मां पर नाराज होने लगी और बोली अब वह काम चौधरी के यहां काम नहीं करेगी। काम करने से उसके कपड़े खराब हो जाएगी और उसकी हथेलियाँ भी वह अब सिर्फ आराम करेगी। जैसे उंची हवेली की लड़कियां रहती है वह भी रहेगी। मां उसे समझाने कि बहुत कोशिश करती है पर लता को अब मां की कोई भी बात अच्छी नही लगती थी।

अगले दिन सुबह जब लता मुर्गी के पास जाती है और देखती है कि आज भी मुर्गी ने एक ही अण्डा दिया तो लता भड़क जाती है और मुर्गी पर जोर-जोर से चिल्लाने लगती है कि जब लता ने बोला उसे दो अण्डे चाहिए तो उसने एक अण्डा क्यों दिय। लता मुर्गी को मारने के लिए वही पड़ी एक लकड़ी उठा लेती है। तभी वहां बाबा आ जाते है जिसने लता को वह मुर्गी दी थी।

लता को रोकते हुए बाबा लता से पुछते है कि वह मुर्गी को क्यों मार रही है तो लता बोली कि वह मुर्गी लता कि बात नहीं मान रही है।
उससे लता ने दो अण्डे मांगे पर वह एक ही अंडा दे रही है। लता से बाबा ने बोला ऐसी क्या मुश्किल आ गई कि लता के लिए एक अंडा प्रयाप्त नही रहा है।

लता ने बोला कि उसे अपने लिए बड़ी हवेली चाहिए। उसे इस झोपड़ी में नही रहना बाबा ने बोला कि तुम तो रोज सारा वक्त हवेली में ही बिताती हो चौधरी के घर तो फिर तुम्हें एक हवेली क्यों चाहिए?

लता ने बोला कि अब वह चौधरी के घर नही जाती, पुरा दिन इसी झोपड़ी में रहती है जब से मुर्गी उसके पास आई है।

बाबा लता को उसके बाद सारी गलतियाँ गिनवाते है कि वह झूठ बोलने लगी है, आलसी हो गयी है, और सबसे बड़ी बात अब वह पहले पहले कि तरह अपनी मां का ना तो बात मानती है और ना ही उसका ध्यान रखती। अब बाबा उस मुर्गी को लता से वापस अपने साथ ले जाएगें।
यह सुनते ही मुर्गी खुद बाबा के पास चली जाती है। देखते ही देखते मुर्गी और बाबा दोनों लता से दूर चले जाते है। लता को उसके बाद अपनी गलती का बहुत पछतावा होता है।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि कभी भी लालच नही करना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी इच्छा को नियंत्रन रखना है वह व्यक्ति अपनी जिन्दगी में हमेशा आगे रहता है।

पागल हाथी की कहानी

विजय नगर के राजा की सवारी का खास हाथी था। जिसका नाम बादल था। राजा की खास सवारी इसलिए था क्योंकि बादल उन्हें अपने जन्मदिन के तौफे में उनके पिताजी ने दिया था।

बादल बहुत ही सीधा और समझदार किस्म का हाथी था मगर कभी कभी उसका मूड बिगड़ जाता तो वह अपना आपा खो बैठता था। उसके बाद तो वह महावत की भी नहीं सुनता।

एक बार तो अपने पागलपन में एक महावत को ही जान से मार डाला। यह खबर जब महाराज को पता चली तो राजदरबार में उपस्थित सभी व्यक्ति ने बादल को महाराज की सवारी से निकाल देने कि सलाह दिया। महाराज ने भी सबकी सलाह सुनने के बाद अपनी सवारी से बादल को हटा देने का आदेश।

उसके बाद उसको कुलियों की तरह लकड़ियां ढोने में लगा दिया गया। बादल को रात में बरगद के पेड़ से मोती जंजारों से बांध दिया जाता। खाने के लिए सुखी टहनियां दी जाती थी उन्ही को खा कर अपनी भूख शांत करता था।

एक दिन बादल अपनी पहले की बातों को याद करता तो सोचा पहले मैं महाराज की सवारी का हाथी था। मुझें रोज स्नान करवाया जाता था। खाने के लिए मुझें मेरे पसंद के फल मिलते थे। अब कहा मामूली सा मजदूर बनकर रह गया हूँ। यह सोच सोचकर उसे इतना गुस्सा आया की जंजीरे तोड़ दी और जंगल की तरफ भाग निकला।

पहले तो जंगल की एक नदी में जाकर खूब नहाया। नहाकर जंगल में आगे बढा तो उसे केले का बगान नजर आया बादल खुश हुआ और केले खाने लगा। महल के सिपाही बादल को पकड़ने के लिए पीछे गए पर उसके डर के कारण कोई उसके पास नहीं गया। वह दूर से उसे देख महल वापस लौट गए।
जंगल में पेट भर केले खाने के बाद बादल जंगल के हाथियों को ढूँढना शुरू किया। कुछ देर जंगल में चलने के बाद उसके साथी दिख गए पर जब उसके साथियो ने उसके पाँव में टूटी जंजीर देखी तो उससे मुँह फेर लिया।

उनको ऐसा लगा की एक तो यह गुलाम था और अब नमक हराम गुलाम हो गया हैं। उससे बोले तुम्हारी जगह इस जंगल में नहीं हैं और उसके साथी वहाँ से चले गए। बादल खड़ा-खड़ा उनको देखता ही रह गया। वह वापस भागता हुए महल की तरफ बढ़ गया।

वह रास्ते ही में था कि उसने देखा कि राजा साहब शिकारियों के साथ घोड़े पर जंगल की ओर चले आ रहे हैं। बादल फौरन एक बड़ी चट्टान की आड़ में छिप गया। राजा साहब जरा दम लेने को घोड़े से उतरे धूप भी बहुत तेज थी। अचानक बादल चट्टान आड़ से निकल जाता और गरजता हुआ राजा साहब की ओर दौड़ा।

राजा साहब घबराकर भागने लगते है और एक छोटी झोंपड़ी जान बचाने के लिए घुस जाते है। जरा देर बाद बादल भी झोपड़ी के पास पहुंचा। उसने राजा साहब को अंदर घुसते देख लिया था। पहले तो उसने अपनी सूंड़ से ऊपर का छप्पर गिरा दिया, फिर उसे पैरों से रौंदकर चूर-चूर कर डाला।
महाराज एक कोने में खड़े होकर बादल को एक टक से देखे जा रहे थे कि तभी उनका घोड़ा उनके निकट आ जाता है। राजा उस पर चढ़ वहाँ से अपनी जान बचा सिपाहीयों के साथ महल लौट जाते है।

महाराज ने महल लौटते ही नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो व्यक्ति बादल हाथी को पकड़कर लाएगा उसको उचित इनाम दिया जायेगा। इनाम के लालच में कई लोग जंगल में उसको पकड़ने गए पर कोई लौट कर नहीं आया।

गोविन्द नाम का लड़का था जो सात आठ साल का था। महाराज उसको और उसकी माँ को हर महीने घर खर्च दिया करते थे। गोविन्द ने सोचा की क्यों ना मैं बादल को पकड़ कर राजा के पास ले जायूँ पर था तो एक बालक मगर उसमें हिम्मत बहुत था।

गोविन्द बादल को पकड़ने कर लाने के लिए तैयार हो आया। गोविन्द की माँ ने उसे समझया पर उसने एक न सुनी और जंगल में चला गया। गोविन्द जब जंगल में कुछ दूर ही चला तो उसने देखा की बादल उसकी तरफ चला आ रहा हैं और उसकी चलने से ऐसा लग रहा था की उसका गुस्सा ख़त्म हो गया हैं। गोविन्द दौड़ कर पास के पेड़ पर चढ़ गया। बादल जैसे ही पेड़ के नजदीक आया तो गोविन्द ने पेड़ के उप्पर से ही उसे पुचकारा और उसकी पीठ पर अपना हाथ फेरा और सर को सहलाया।

बादल अपनी जिंदगी में यही पल तो याद कर रहा था कि पहले की तरह कोई उसकी तरफ प्यार से देखे, उससे प्यार करे, बादल की आंखों से आंसू निकलने लगा। बादल ने भी अपनी सूंढ गोविन्द की ओर बढ़ाया और उसे पेड़ से उतार कर अपनी पीठ पर बिठा लिया।

बादल उसकी आवाज को अच्छे से पहचानता था। गोविन्द को बादल देखकर पहचान गया गोविन्द पहले से बादल के साथ खेलता था। उसे याद आया की मैंने ही इसके बाप को मारा था। गोविन्द फिर भी बादल के पास आया और उसे प्यार से सहलाया बादल ने सोच लिया की चाहे कुछ भी हो जाए पर वह अब अपना आपा नही खोएगा। गोविन्द को पीठ पर बैठा बादल राजमहल की और चल दिए।

जब गोविन्द बादल के साथ महल पहुँचा तो सब देखते ही रह गए, फिर भी किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उसके पास चला जाये। गोविन्द बोला डरो मत यह अब सीधा हो गया हैं। महाराज भी डरते डरते बादल के पास आये पर उनको भी देख कर अच्छा लगा की बादल अब एक दम ठीक हो गया हैं।

महाराज ने गोविन्द को बहुत अच्छा इनाम दिया और उसे अपना ख़ास महावत बना दिया। इसके साथ ही बादल की देख-रेख भी उसे ही सौप दिया। महाराज का मनपसंद सवारी वह फिर से बन गया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि प्यार से आप बड़े से बड़े और ताकतवर को आप जीत सकते है। नफरत के बदले नफरत करने से रिस्तों में दूरी आ जाती है और इस कदर की एक दूसरे की जान भी ले लेते हैं पर नफरत के सामने प्यार हमेशा जितता है।

परीक्षा- प्रेमचंद्र की लघु कथाओं में से एक

देवगर नाम का एक राज्य था। वहां के राजा का नाम भीम सिंह था। भीम सिंह अपने राज्य में गरीबों और बेसहारा लोगों की मदद किया करते थे। उनके राज्य में दीवान था। जिस पर राजा बहुत भरोसा किया करते थे। दीवान का नाम देवरथ था। जो पुरे राज्य में घुम-घुम कर लोगों की परेशानी सुन उसे राजा तक पहुंचाया करता था। उनके बाद राजा अपनी परेशान प्रजा की तुरंत मदद किया करते थे।

एक दिन दीवान देवरथ राजा के पास आया और बोला वह अब राज्य में घुम-घुम कर काम नही कर सकते। उनकी उम्र हो गई, अब उन्हें राज्य का भार उनसे ले लिया जाए।

राजा भीम सिंह देवरथ की बात सुनते ही मानों उनके पैर से जमीन खिसक गई हो। वो एकदम व्याकुल हो गए और बोले में आपके बिना मैं कुछ नहीं हूँ , आप राज दरवार छोड़ने के बारे सोच भी कैसे सकते है?

दीवान देवराथ ने कहा – राजन मैं आपकी बातों से सहमत हूँ पर कृप्या कर आप मेरे बारे भी सोचे कि मैंने 50 वर्ष तक आपकी सेवा की है। अब मेरी उम्र हो गई है अब मै राज्य में घुम-घुम कर राज्य के लोगों की समस्या तक नहीं पहुंच पा रहा हूँ। राजन यह कार्य आप किसी और को सौंप दीजिए।

राजा भीम सिंह ने देवरथ को कहा ठीक है तो यह आखरी काम भी आप कीजिए, मुझे अपने पद के लिए अपने जैसा समझदार और लोगों की समस्या को जो अपनी समस्या समझे ऐसा व्यक्ति आप ढूंढ कर दीजिए।

देवरथ ने कहा इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। मैं आपको मुझसे भी लायक जो अपने पद के जिम्मेदारी बाखूबी निभा सके वैसा दीवान ढूँढ कर दूँगा।
अगले ही दिन सभी राज्य में देवरथ ने दीवान पद की परीक्षा के लिए एक समझदार और काबिल व्यक्ति की तलाश की घोषणा करवा दी।
दूसरे दिन से ही दूसरे राज्य और देवनगर से भी व्यक्ति राज्य में परीक्षा देने के लिए आने लगे। परीक्षा में पहुंचे सभी व्यक्ति को राज महल में बहुत ही ठाठ से रूकने की व्यवस्था की गई थी।

देवनगर में दीवान के पद के लिए पंडित, पुरोहीत और सभी जाति के लोगों को एक साथ ही ठहराया गया था। जिन्हें दूसरे जाती के लोगों के साथ रहने और खाने-पीने में दिक्त थी।उन्हें उसी वक्त राजमहल से जानेे की आज्ञा थी।

दीवान बनने की लालसा लोगों में इतनी थी कि सब महल में आते ही जाति और धर्म भूल जा रहे थे।

दीवान देवराथ दूर से ही सभी को देखते रहते थे। क्योंकि महल में आते ही उनकी परीक्षा प्रारंभ थी। सभी एक दूसरे के साथ मिल-जुलकर रह रहे थे। जितने लोग महल में रूके थे। देवरथ की हर बात को झट से मान जा रहे थे। कोई भी व्यक्ति किसी भी बात के लिए मना नही करता और ना ही अपनी कोई राय प्रकट कर रहा था। देखते-ही-देखते पंद्रह दिन गुजर गए।

एक दिन राजा भीम सिंह से देवरथ को अपने पास बुलाया और पूछा क्या हुआ? आपसे मैने एक दीवान चुनने को कहा पर आप तो महल में करीब 50 दीवान को अपनी जगह चुन बैठे हैं।

देवराथ ने कहा, महराज आप कुछ दिन दीजिए। मैं आपको अपना वादा पूरा कर दिखाउंगा। बगुले के बीच हंस कहीं छिपा बैठा है, मैं खुद उसकी तलाश में हूँ यह बोल देवरथ मुस्कुराने लगा।

एक दिन देवरथ ने सभी परीक्षा देने आए लोगों से कुश्ती खेल खेलने के राज्य के मैदान में कहा। खेल का नाम सुनते ही जो ज्यादा उम्र के व्यक्ति परीक्षा देने आए, उन्होने खेल खेलने से मना नहीं किया पर उन्होने कहा कि सतरंज या फिर कोई दिमाग से खेलने वाला खेल खेलाया जाए। वह कुश्ती नहीं खेल सकते इस उम्र में अगर हडियां टुटी तो जुड़ भी नहीं पायेगी।

देवरथ उसकी बातों से सहमत हुआ और दो ग्रुप बना दिया। आधे लोग कुस्ती खेलेगें और आधे सतरंज, मगर खेल देखने के लिए सब को एकसाथ ही रहना होगा।

सबने तय कर लिया की कल कुस्ती होगी और परसो सतरंज। उसमें से एक व्यक्ति जिसका नाम सुरजीत था उसने दोनों में खेल खलने की इच्छा प्रकट की। देवरथ ने उसकी बात मान ली और उसका नाम दोनों खेल में लिखा गया।

परीक्षा में उपस्थित कुछ लोग सुरजीत से जल रहे थे। क्योंकी उसने पहली बार देवरथ के आगे दोनों खेल खेलने की इच्छा व्यक्त की थी। अगले दिन खेल के मैदान में कुछ लोगों ने सुरजीत को कुश्ती में हराने की सोच उस पर गलत और खेल केविपरीत नियम से वार कर रहे थे।

देवरथ खेल को देख रहा था पर वहाँ उपस्थित किसी व्यक्ति ने गलत तरीके से खेल खेलने पर कोई भी आपती नहीं जताई। देवरथ बस सुरजीत को देख रहा था कि उसने खेल में एक बार भी खेल से विपरीत कोई भी तरीका इस्तेमाल नहीं किया। सुरजीत को काफी चोट आई और वह एक पैर से लंगराने भी लगा। उसके बाद उसने खुद खेल छोड़ने की अनुमती ली, क्योंकि उसके पैर में बहुत दर्द हो रहा था।

सुरजीत को पीड़ा में देख कौन-कौन उसकी मदद को आता है। देवरथ सिर्फ यह देखना चाहता था, पर कोई भी उसकी मदद को नहीं आया। जो खेल में भाग नही भी लिए थे उनमें से भी कोई व्यक्ति उसकी मदद को नहीं आया।

खेल समाप्त होने के बाद सभी लोग महल की ओर चल पड़े। महल जाने के रास्ते में बीच में एक छोटी सी नदी मिलती थी। उस नदी पर एक पूल था पर वह काफी दिनों से टुटा हुआ था। पुल नहीं होने के कारण सभी को महल जाने के लिए नदी में घुस कर ही पानी के रास्ते ही आना जाना पड़ता था। सभी लोग जब जा रहे थे तो देखा एक किसान दो बैलों के साथ अपनी बैल गाड़ी के साथ नदी में फंसा हुआ है। उसकी बैल बैलगाड़ी को पानी से बाहर खींच नही पा रही थी।

सभी ने देखा पर कोई भी व्यक्ति उस किसान की मदद के लिए आगे नहीं आया। सब बस ऐसा दिखा रहे थे कि वह बहुत थके हुए है। किसान मदद लेना चाहता था पर उसने देखा की सभी उसे नजर अंदाज कर जा रहे थे तो उसकी मदद नहीं करेगे।

किसान फिर अपनी बैंलों को गुस्से में चाभुक मारता है। बैल बैलगाड़ी खींचते मगर ढलान होने के कारण वापस पानी में गाड़ी आ जाती।
सुरजीत लंगड़ाते-लंगड़ाते काफी देर के बाद पानी के पास पहुंचा तो किसान और बैलगाड़ी को फंसा देख किसान से पुछा? क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूँ। किसान ने देखा यह व्यक्ति तो खुद डंडे के सहारे चल रहा है वह क्या मदद करेगा?

किसान ने बोला आप खुद तो ठीक से चल नही पा रहे, आपसे मदद कैसे लूँ । सुरजीत मुस्कुराया और बोला मैं ठीक से चल रहा हूँ, यह डंडा ही सीधा नहीं हैं और मुस्कुराने लगा। उसके बाद सुरजीत ने पहले उसने अपने डंडे को बैलगाड़ी पर रखा और किसान को बोला मै धक्का लगा रहा हूँ पीछे से आप बैलो को मारना नहीं पुचकारों वह चढ़ जाएगा।

इस बार किसान ने बैलों को मारा नहीं बस उसने नाम से पुकारा और सुरजीत ने पूरा जोड़ लगा कर बैलगाड़ी को धक्का मारा, बैलगाड़ी पानी से बाहर आ गया। उसके बाद किसान ने सुरजीत को महल तक छोड़ा जब किसान महल से वापस जा रहा था। तो देवरथ ने किसान को धन्यवाद बोला की उसने सुरजीत की मदद की। उसके बाद किसान ने देवरथ को सारी कहानी बताई की किस तरह पीड़ा में हाने के बाद भी उसने किसान की बैलगाड़ी नदी से निकालने मैं उसकी मदद सुरजीत ने की।

दीवान ने अगले ही दिन सुबह सभी परीक्षा देने आए व्यक्ति को दरवार में उपस्थित होने का निमंत्रण भेजवाया और कहा इस राज के लिए आए सभी उम्मीदवारों मेें से एक को इस पद के लिए दीवान के लिए चुन लिया गया है। जिसका नाम वह आज राजा के सामने लेगे। सभी से निवेदन है वह दरवार में उपस्थित हो।

सभी लोग उत्साह और खुश होकर दरवार में गए। दीवान देवरथ ने हाथ जोड़ कर खड़े होकर सभी परीक्षार्थी से पहले तो माफी मांगी की उन्हें इतना वक्त लगा दीवान चुनने में । उसके बाद दीवान ने कहा कि इस पद के लिए ऐसे पुरूष की आवश्यकता है जिसमें साहस भी हो, धैर्य भी, जिसके हिृदय में दया हो, और वीर भी हो, जो अपने से पहले दूसरों की तकलीफ को दुर करने का साहस रखता हो और मुझे ऐसा व्यक्ति मिल गया है। जो इस रियासत के लोगों के बारे में हृदय से सोचेगा। मैं सुरजीत को इस रियासत का दीवान घोषित करता हूं।

सभी ने सुरजीत को बधाई दी और राजा भी देवरथ की पसंद से प्रसन्न हुए।

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