महात्मा गांधी की प्रेरणादायक कहानी | सच के पूजारी | Inspiration Story

आपके लिए आज हम कुछ नई तरह की कहानी (inspiration Story) लेकर आये हैं. इसको पढ़ने के बाद आपको प्रेरणा मिलेगी. इसके साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से जुड़ी जानकरी से अवगत भी करायेंगे. आइये हम इसको न केवल पढ़ेंगे बल्कि अपने जीवन में ढालने का प्रयास भी करेंगे.

सच के पूजारी – महात्मा गांधी की Inspiration Story

महात्मा गांधी का नाम तो पुरे संसार में प्रसिद्ध है.

महात्मा गांधी को हम सब राष्ट्रपिता “बापू” के नाम से भी जानते हैं.

सत्य का आचरण भी उनका मुख्य गुण था.

एक बार की बात है. महात्मा गांधी के बचपन में, घर के नजदीक एक बार ’सत्य हरिशचंद्र नामक राजा का नाटक खेला गया. गांधी जी भी उसे देखने गए. नाटक में राजा हरिशचंद्र की सत्यप्रियता-दिखाई जा रही थी. राजा हरिशचंद्र अपने कर्तव्य और सत्यप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे. जिसके कारण उनकी प्रजा बहुत खुश और सुखी थी. उनके इस चरित्र को देखकर गाँधी जी का भावुक हृदय पिघल गया. तभी से गांधी जी कर्तव्य, सत्य और अहिंसा के प्रति प्रेम ने उनके मन में अपना स्थान बना लिया.

गांधी जी के बचपन की बात है, तब वे विधालय में पढ़ते थे. विधालय में शिक्षाधिकारी बच्चों का निरक्षण करने आए थे. निरक्षण ने गाँधीजी की कक्षा में अंग्रेजी के पाँच साधारण शब्दों को शुद्ध रूप में लिखने के लिए कहा. उनमें से एक शब्द था ’केटल’. उसे शुद्ध रूप में लिखने में विद्यार्थी समर्थ नही थे.

अध्यापक ने निरीक्षण को अपनी पीठ की ओट में करके उस शब्द को शुद्ध रूप में लिख दिया और संकेत करके विद्यार्थियों से उसे लिखने को कहा. सारे विद्यार्थियों ने तो अध्यापक के संकेत से उस शब्द को शुद्ध से लिख दिया, परंतु गांधी जी के मन ने इस काम को स्वीकार नहीं किया. अतः उन्होंने उस शब्द को नही लिखा. अन्य सभी विद्यार्थियों ने गांधी जी की हँसी उड़ाई.

जब निरीक्षण-कार्य पूरा हो गया और निरीक्षक महोदय चले गए तो अध्यापक जी को गांधी जी पर बहुत क्रोध आया. उन्होने गांधी जी को डांट भी लगायी.

गांधी जी जब घर पहुँचे तो उन्होंने इस बात पर गंभीरता से विचार किया. पर्याप्त सोच-विचार के बाद वे इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि उन्होंने जो कुछ किया, उचित ही किया है. ऐसी थी गांधी जी की सत्यप्रियता.

कर्ज लेकर शान दिखाने से ये खजूर भली – Best Hindi Story

एक स्कूल के छात्रों ने एक बार पिकनिक का प्रोग्राम बनाया. सभी बच्चे ने आपस में तय किया कि इसके लिए अपने घर से कुछ न कुछ खास खाने की चीज बनवाकर लायेंगे. उसी स्कूल के स्टूडेंट्‍स में एक बहुत ही गरीब छात्र भी था. मां ने बताया कि घर में बनाने के लिए कोई खास चीज नहीं है. यह सुनकर बालक बहुत दुखी हो गया.

उनकी मान को तभी कुछ याद आया. उनकी मां ने कहा कि बेटा घर में कुछ खजूर रखे हैं तू उन्हें ले जा. मगर उसके कुछ देर बाद मां को लगा कि पिकनिक पर बाकी सभी बच्चे खाने-पीने की अच्छी चीजें लेकर आएंगे, ऐसे में बेटा खजूर ले जाएगा तो ठीक नहीं लगेगा.

मां ने तुरंत बेटे से कहा कि तुम्हारे पिताजी आने वाले हैं. जैसे ही वे आएंगे, मैं बाजार से अच्‍छी चीज मंगवा लूंगी. बच्चा निराश होकर एक तरफ बैठ गया. थोड़ी देर बाद पिता घर आए. बेटे को उदास बैठा देखकर उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा- क्या हुआ? और पत्नी ने उन्हें सारी बात बताई. पति-पत्नी देर तक आपस में विचार कर रहे थे.

घर के आंगन में बैठा बालक उन्हें देखता रहा, उसे दुख था कि उसके पिता चप्पल पहनकर बाहर जा रहे हैं. बालक ने पूछा- ‘पिताजी मैं क्या जान सकता हूं कि आप कहां जा रहे हैं? तब उस बालक के पिता ने कहा, “बेटा तेरी उदासी मुझसे देखी नहीं जाती, मैं अपने मित्र से कुछ पैसे उधार लेने जा रहा हूं जिससे तू भी पिकनिक पर अच्छी चीजें ले जा सकेगा”.

बालक ने जवाब दिया- नहीं पिताजी, उधार मांगना अच्‍छी बात नहीं है. मैं पिकनिक पर ये खजूर ही ले जाऊंगा. कर्ज लेकर शान दिखाना बुरी बात है. पिता ने पुत्र को सीने से लगा लिया. यही बालक बड़ा होकर पंजाब केसरी लाला लाजपतराय के नाम से विख्‍यात हुआ.

गोपाल कृष्ण गोखले की ईमानदारी | Hindi Story | Inspirational Story

गोपाल कृष्ण गोखले किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं. मगर उनके बारे में एक कहानी बताने जा रहा हूं. जो उनकी बचपन की तस्वीर पेश करती है. गोपाल कृष्ण गोखले भारत के स्वतंत्रता-सेनानियों में से एक थे. उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी बुध्दि बड़ी ही कुशाग्र थी.

यह कहानी जब तब की है जब वह स्कुल में पढ़ते थे. उनके गणित के शिक्षक ने सभी बच्चों को घर से गणित के कुछ प्रश्न हल कर लाने कहा.

सब बच्चों ने अपने-अपने घर पर प्रश्न हल किए. गोपाल कृष्ण गोखले ने भी घर पर प्रश्न हल किए. मगर उन प्रश्नों में एक प्रश्न ऐसा था जो गोपाल के समझ में नहीं आ रहा था. इसके लिए उन्होंने काफी मेहनत किया मगर उसका हल नहीं कर सकें. उन्होंने उस प्रश्न को छोड़कर बाकि प्रश्नों के हल कर लिए थे. जो सवाल वो हल नहीं कर पाए थे उसको अपने किसी मित्र के सहायता से हल कर लिया.

जब सारे बच्चे स्कुल पहुंचे तब शिक्षक ने जब सारे बच्चों की कापियां देखी तो केवल गोपालकृष्ण के ही सारे प्रश्न ठीक से थे. शेष बच्चों में से किसी के एक तो किसी के दो सवाल के गलत जबाब थे.

शिक्षक गोपालकृष्ण से काफी खुश हुए. वो गोपालकृष्ण को कुछ ईनाम देने लगे. मगर बालक गोपालकृष्ण ने ईनाम लिया नहीं और उलटे रोने लगे. यह सब देखकर शिक्षक को काफी हैरानी हुई और उन्होंने गोपालकृष्ण को रोने का कारण पूछा.

गोखले ने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा- “आपने तो यह सोचा होगा कि यह सारे प्रश्न मैंने अपनी बुद्दि से निकला है, मगर यह सच नहीं है. इनमें से एक प्रश्न का हल अपने एक मित्र की सहायता से किया है. सर अब बताइये कि मैं ईनाम का अधिकारी हूं या दंड का?”

गोखले की बात सुनकर शिक्षक आश्चर्ज से उनके मुंह ताकते रह गए. उन्होंने यह सोचा- यह बालक कितना सत्यवादी है और त्यागी है. जब वो सोच में पड़े तो सोचते ही रह गए. इसके बाद शिक्षक बालक के जबाब से काफी प्रसन्न हुए. उन्होंने गोखले के हाथ में ईनाम देते हुए कहा- “यह ईनाम तुम्हारी ईमानदारी का है.”

 

 

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