Monday, April 2, 2018

ईमानदारी - बूढ़े दुकानदार की प्रेणादायक हिंदी कहानी | Best Hindi Stories

ईमानदारी - बूढ़े दुकानदार की प्रेणादायक हिंदी कहानी | Best Hindi Stories

ईमानदारी - बूढ़े दुकानदार की प्रेणादायक हिंदी कहानी | Best Hindi Stories


भोपाल मध्यप्रदेश का प्रमुख नगर है और साथ ही प्रदेश की राजधानी भी है. काफी समय पहले की बात है. वहां एक अवकाश प्राप्त पुलिस अधिकारी रहते थे. उनका नाम था दीनदयाल सक्सेना. उनका परिवार अत्यंत बलवान और ईनामदार था. अपनी ईमानदारी और तत्पर सेवा के लिए श्री दीनदयाल सक्सेना ने राष्ट्रपति पदक भी प्राप्त किया था.

एक दिन की बात है. उनके परिवार का एक बालक अशर्फियों में से एक अशर्फी उठा ले गया. बालक सात से आठ बरस का रहा होगा. उसे यह भी मालूम नहीं था कि उन अशर्फियों का मूल्य क्या है. उसे बस यही पता था कि उससे किसी वस्तु को खरीदा जा सकता है. 

शहर में जुमेराती दरवाजे के नीचेएक मियां साहब दुकान लगाकर बच्चों की रबर गेंद बेच रहे थे. बालक ने अशर्फी बूढ़े मियांजी के तरफ बधाई और एक रंगीन गेंद की तरफ इशारा करते हुए बोला, "बाबाजी, वह गेंद मुझे दे दो."

उस बूढ़े दूकानदार ने उस बालक को वह गेंद दे दी और उनकी दी हुई अशर्फी अपने हाथ में दबा ली.

बालक गेंद पाकर बहुत खुश हुआ और ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर के तरफ चल दिया. इसके बाद वह बुजुर्ग दूकानदार भी उसके पीछे उसके घर पहुंच गए. बालक के पिता के हाथ में अशर्फी देते हुए बूढ़े दुकानदार ने कहा, "जनाब जरा बच्चों पर निगाह रखा कीजिए. आपके साहबजादे ने मुझे यह अशर्फी देकर यह गेंद खरीदी है".


बूढ़े दुकानदार की बात सुनकर बालक के पिता हैरान हो गए और कुछ समझ नहीं सके.

तब दुकानदार ने उनको पुनः बताया, "यह बालक मुझे यह अशर्फी देकर वह गेंद लाया है  जो इसके हाथ में है".

बालक के पिता दूकानदार के ईमानदारी पर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन बुजुर्ग दुकानदार को ईनाम देने लगे. परन्तु उन्होंने न कोई ईनाम लिया और न ही गेंद का मूल्य लिया. वो बालक के पिता को अशर्फी लौटा कर वापस चल गए.

ऐसे व्यक्ति की जितनी प्रशंसा की जाए, कम ही है. सच ही कहा गया है कि कोई भी किसी के ईमानदारी की बराबरी नहीं कर सकता है. 

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